Monday, 13 February 2017

बस तुमको सोचता हूँ - चिराग़

आज जल्दी उठ गया हूँ,
कब से तुमको सोचता हूँ।
आज तुमसे मिल न पाया,
कर लिया सब कुछ न भाया।

कैसे ये दिन कट रहा है,
खाई सा है पट रहा है।

सोचता हूँ सोयी होगी,
ख्याल में कुछ खोयी होगी,

सोचता हूँ जागी सी होगी,
दौड़ती भागी सी होगी।

सोचता हूँ टहल रही है,
चाय भी उबल रही है,
फोन में चलते हैं गाने,
सुनाती होगी किस्से फसाने।

अब सोचता हूँ थम गई हो,
आईने में रम गई हो।
बिस्तर का एक कोना,
और ना किसी का पास होना।

सोचता हूँ शाम है अब,
होगा किसी से काम अब,
बाल तुमने बांधे होंगे,
रंग ओढे सादे होंगे।

सोचता हूँ,
साथ किसके चलती होगी,
किसके जैसा ढलती होगी।

सोचता हूँ रात है अब,
सिर्फ रहे जज्बात हैं अब।
खुद को तुमने संवारा होगा,
एक चेहरा उतारा होगा।

सोचता हूँ पास आऊं,
या कि बस अब याद आऊं।

                        ------------ चिराग़ शर्मा